माउंटबेटन की वो धमकी जिसके आगे जिन्ना को टेकने पड़े घुटने, जानें पाकिस्तान पर क्या पेंच फंसा था

3 जून 1947. विभाजन की कीमत पर भारत की आजादी की मंजूरी का दिन. सिर्फ ऐतिहासिक नहीं बल्कि भारत का भूगोल बदलने वाली इस बैठक में ब्रिटिश वायसराय लार्ड माउंटबेटन के साथ सरदार पटेल, पंडित नेहरु, आचार्य कृपलानी, मोहम्मद अली जिन्ना, लियाकत अली खान और सरदार बलदेव सिंह मौजूद थे. विभाजन, उसकी प्रक्रिया और अंग्रेजों की वापसी की सार्वजनिक घोषणा इस बैठक के जरिए होनी थी. बैठक में फिर से बहस-मुबाहसा शुरु न हो जाए, इसका माउंटबेटन ने पहले ही पुख़्ता इंतजाम किया था.

असलियत में एक दिन पहले 2 जून को वे इन नेताओं से बैठक कर चुके थे. अगले दिन की जाने वाली घोषणा की मंजूरी भी ले चुके थे. जिन्ना फिर भी टाल-मटोल कर रहे थे. उन्होंने आखिरी मंजूरी के लिए फैसले को मुस्लिम लीग की नेशनल काउंसिल के सामने रखने का पेंच फंसाया. जिन्ना को ‘कटा-बंटा दीमक लगा’ पाकिस्तान कुबूल करने में हिचक थी.

धमकी के अंदाज में दिया था रातभर का वक्त

माउंटबेटन ने तकरीबन धमकाने वाले अंदाज़ में उन्हें सिर्फ रात भर का वक्त दिया. बैठक में मेरी घोषणा पर स्वीकृति में आप सिर्फ सिर हिलाएंगे. स्टेनली वोलपर्ट ने अपनी किताब ” जिन्ना- मुहम्मद अली से कायद-ए-आज़म” में माउंटबेटन को उद्धृत किया है, “माहौल में तनाव था. मुझे लग रहा था कि नेता जितनी कम बात करेंगे, बैठक के नाकाम होने की संभावनाएं उतनी कम होंगी. मैंने नेताओं से कहा कि आधी रात तक अपने जवाब से वाक़िफ करा दें. जिन्ना ने कहा कि कार्यसमिति से बात करने के बाद रात ग्यारह बजे वे खुद मिलने आएंगे. मैंने उन्हें रोके रखा. ताकि उन पर प्रभाव पड़ सके कि लीग की तरफ से अब इनकार का कोई सवाल नहीं पैदा होना चाहिए.”

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